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आपो॒ यं वः॑ प्रथ॒मं दे॑व॒यन्त॑ इन्द्र॒पान॑मू॒र्मिमकृ॑ण्वते॒ळः। तं वो॑ व॒यं शुचि॑मरि॒प्रम॒द्य घृ॑त॒प्रुषं॒ मधु॑मन्तं वनेम ॥१॥

English Transliteration

āpo yaṁ vaḥ prathamaṁ devayanta indrapānam ūrmim akṛṇvateḻaḥ | taṁ vo vayaṁ śucim aripram adya ghṛtapruṣam madhumantaṁ vanema ||

Pad Path

आपः॑। यम्। वः॒। प्र॒थ॒मम्। दे॑व॒ऽयन्तः॑। इ॒न्द्र॒ऽपान॑म्। ऊ॒र्मिम्। अकृ॑ण्वत। इ॒ळः। तम्। वः॒। व॒यम्। शुचि॑म्। अ॒रि॒प्रम्। अ॒द्य। घृ॒त॒ऽप्रुष॑म्। मधु॑ऽमन्तम्। व॒ने॒म॒ ॥१॥

Rigveda » Mandal:7» Sukta:47» Mantra:1 | Ashtak:5» Adhyay:4» Varga:14» Mantra:1 | Mandal:7» Anuvak:3» Mantra:1


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SWAMI DAYANAND SARSWATI

अब सैंतालीसवाँ सूक्त का आरम्भ है, इसके प्रथम मन्त्र में फिर मनुष्य प्रथम अवस्था में विद्या ग्रहण करें, इस विषय को कहते हैं ॥

Word-Meaning: - हे मनुष्यो ! (देवयन्तः) कामना करते हुए जन (वः) तुम्हारी (इळः) वाणी को (प्रथमम्) और प्रथम भाग जो कि (इन्द्रपानम्) जीव को प्राप्त होने योग्य उसको (आपः) तथा बहुत जलों के समान वा (ऊर्मिम्) तरंग के समान (यम्) जिसको (अकृण्वत) सिद्ध करें (तम्) उस (शुचिम्) पवित्र (अरिप्रम्) निष्पाप निर्दोष (घृतप्रुषम्) उदक वा घी से सिंचे (मधुमन्तम्) बहुत मधुरादिगुणयुक्त पदार्थ को (वः) तुम्हारे लिए (वयम्) हम लोग (अद्य) आज (वनेम) विशेषता से भजें ॥१॥
Connotation: - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । जो विद्वान् जन पहिली अवस्था में विद्या ग्रहण करते और युक्त आहार-विहार से शरीर को नीरोग करते हैं, उन्हीं की सब सेवा करें ॥१॥
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SWAMI DAYANAND SARSWATI

पुनर्मनुष्याः प्रथमे वयसि विद्यां गृह्णीयुरित्याह ॥

Anvay:

हे मनुष्या ! देवयन्तो व इळः प्रथममिन्द्रपानमापऊर्मिमिव च यमकृण्वत तं शुचिमरिप्रं घृतप्रुषं मधुमन्तं वो वयमद्य वनेम ॥१॥

Word-Meaning: - (आपः) जलानीव विद्वांसः (यम्) (वः) युष्माकम् (प्रथमम्) (देवयन्तः) कामयमानाः (इन्द्रपानम्) इन्द्रस्य जीवस्य पातुमर्हम् (ऊर्मिम्) तरङ्गमिवोच्छतम् (अकृण्वत) कुर्वन्तु (इळः) वाचः। इळेति वाङ्नाम। (निघं०१.११)। (तम्) (वः) युष्मभ्यम् (वयम्) (शुचिम्) पवित्रम् (अरिप्रम्) निष्पापं निर्दोषम् (अद्य) इदानीम् (घृतप्रुषम्) घृतेनोदकेनाज्येन वा सिक्तम् (मधुमन्तम्) बहुमधुरादिगुणयुक्तम् (वनेम) विभजेम ॥१॥
Connotation: - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। ये विद्वांसः प्रथमे वयसि विद्यां गृह्णन्ति युक्ताहारविहारेण शरीरमरोगं कुर्वन्ति तानेव सर्वे सेवन्ताम् ॥१॥
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MATA SAVITA JOSHI

या सूक्तात विद्वान स्त्री - पुरुषांच्या गुणांचे असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्व सूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी.

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जे विद्वान प्रथमावस्थेत विद्या ग्रहण करतात व युक्त आहार-विहाराने शरीर निरोगी करतात त्यांचीच सेवा सर्वांनी करावी. ॥ १ ॥